सीमा वर्मा
बाल सुलभ वाक़या मन को आल्हादित करता हैं।
बाल संस्मरण
माखन जी
मक्खन को यूं ही कड़ाही में डाला, गैस की आँच से वो पिघलने लगा, छन छन की आवाज़ आते ही उबल कर किनारों की तरफ़ बढ़ गया।
कहीं नीचे ना लग जाए उसने लकड़ी के चम्मच से उसे हिलाया, हिलाते- हिलाते अचानक उसका ध्यान अतीत में चला गया।
जब बच्चे बहुत छोटे थे तो वह उन्हें सिखाया करती थी कि बड़ों से हमेशा जी करके बात करनी है। बच्चे थे सो जल्दी सीख भी गए।
एक सुबह पति और ससुर जी डायनिंग टेबल पर बैठे नाश्ता कर रहे थे और वह गर्मागर्म परांठे सेंक रही थी। तभी छोटे बेटे को उसने मक्खन दिया और कहा जाओ पापा जी और दादा जी को देकर आओ।
वह जैसे ही मक्खन लेकर उनके पास गया अपनी तोतली आवाज़ बोला,
"आप माखन जी लेंगे!" उसने रसोई से सुना तो एकाएक उसके चेहरे पर हँसी आ गई, इधर वह दोनों उससे पूछ रहे थे कि क्या कह रहे हो?
वह फिर भोलेपन से पूछता, "माखन जी लेंगे आप?"
"यह क्या कह रहा है, पतिदेव ने आवाज़ देते हुए पूछा?"
तभी बाहर आकर उसने बताया, "जी! मैंने इसे सबको जी लगाने को बोला है शायद यह मक्खन को भी जी लगा रहा है। बात सुनते ही उनकी हँसी छूट गई।
तब से लेकर वह बहुत देर तक मक्खन को माखन जी ही बोलता रहा। आज भी जब सब उसे बचपन की बात बतातें हैं, तो वह हँस देता है।
अचानक उसके मुँह पर घी का गर्म छींटा पड़ा और वह अतीत से बाहर आई देखा तो घी बन चुका था।
सीमा वर्मा
पंजाब
