शुक्रवार, 11 जून 2021

मेरी पसंदीदा लघुकथा (02) डॉक्टर क्षमा सिसोदिया



          पसंदीदा लघुकथा शृंखला के अंतर्गत प्रस्तुत है, डॉक्टर क्षमा सिसोदिया द्वारा प्रेषित लघुकथाएँ। 

प्रथम  डाॅ. प्रदीप उपाध्याय (देवास) की बड़ा दानदाता लघुकथा।
द्वितीय  डाॅ.क्षमा सिसोदिया (उज्जैन) की सोना बाई लघुकथा। 


 लघुकथा 
 बड़ा दानदाता 
                               
          "अरे यार,उसका कोई चरित्र है? कितना नम्बर दो का पैसा कमाया है। उसे खुद ही नहीं मालूम होगा, कि उसके पास कितनी दौलत है। काला बाजारी कर भ्रष्ट तरीके से धन तो कमाया ही है, दुराचारी भी है। वह किसी के घर बुलाने के काबिल व्यक्ति  नहीं है।"
          "तो हम लोग उसके बंगले पर क्यों जा रहे हैं! ऐसे कमीने आदमी से पुण्य कार्यों के लिए कोई सहयोग हमें लेना भी नहीं चाहिए।"
          "भाई, जाना तो पड़ेगा ही और सहयोग भी लेना पड़ेगा क्योंकि अपने आयोजन के लिए उससे बड़ा दानदाता कोई मिलेगा  नहीं और उसे मुख्य अतिथि बनाएंगे तो अलग से भीड़ जुटाने की आवश्यकता भी नहीं रहेगी।अपनी फाईल पार्टी संगठन में भिजवाने के लिए ऐसे बड़े आयोजनों की भी तो जरूरत रहती है।"

डाॅ. प्रदीप उपाध्याय 
देवास (म. प्र) 
मोबाइल नंबर -9425030009

प्रकाशन 
लघुकथा 14 अप्रैल 2021 को लिखी गयी है। 
दिनांक 16/4/2021 को दैनिक 'लोकमत समाचार' के सभी संस्करणों में तथा 'दैनिक हरियाणा प्रदीप' में प्रकाशित हुई थी। दिनांक 18/4/2021 के दैनिक 'इंदौर समाचार' में प्रकाशित हुई। साथ ही दैनिक लोकमत समाचार ने पुनः 28/4/2021 को इसे प्रकाशित किया। 
अभिमत 
           यह लघुकथा मुझे इसलिए पसंद आयी कि 
(1)"कमाई चाहे जैसी है लेकिन वह अन्य लोगों के भी काम आ रही है।"

2- चतुराई, भ्रष्टाचारी,बेईमानी की शुरूआत कहाँ से और कैसे होती है, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। 
डॉक्टर क्षमा सिसोदिया 
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लघुकथा 

सोना बाई 
           
          विवाह के पाँच साल बाद ही पति ने उसे छोड़ दिया और नन्हीं सी बेटी को भी माँ से दूर कर दिया गया। जिंदगी की मुश्किलों से अकेले जूझने को मज़बूर छत्तीस वर्षीया सोना बाई से माँ-बाप ने भी दामन झटक लिया था। 
        वजह सिर्फ यह थी, कि उसके तन पर कुष्ठ के घाव निकल आए थे। सोनाबाई को इस रोग का पता तब चला, जब वह पहली बार गर्भवती हुई और पाँव में काँच लगने से ज़ख्म बढ़ने लगा, डॉक्टर को दिखाने के बाद असली बीमारी का पता चला। 

       गर्भवती सोना बाई कुष्ठ रोग की दवा भी नहीं खा सकती थी।जैसे ही इस बात का पता पारिवारिक सदस्यों को लगा, सब ने उससे दूरी बना ली। बेटी को जन्म देकर वह एक वर्ष तक अपनी बीमारी से लडती रही और नन्हीं बिटिया की देख-भाल उसकी मौसी करती रही।

          एक साल बाद भी पति ने उसे नहीं स्वीकारा और हमेशा के लिए ठुकरा दिया। न चाहते हुए भी उस दुखयारी को अपनी एक साल की मासूम बेटी से बिछड़कर गाँव छोड़ना पड़ा।
      
    अपनी हिम्मत के साथ उसने  लम्बे समय तक संघर्ष किया। बीमारी को हराने के साथ ही उसने अपनी निरक्षरता पर भी विजय पाई। लम्बे संघर्ष के बाद आत्मनिर्भर बनकर लौटी सोना बाई ने परिवार व समाज में फिर वही सम्मान, वही जगह हासिल की, जो उसे पहली बार गाँव में दुल्हन बनकर आने पर मिला था।

            सोना बाई स्थानीय डॉक्टर की सलाह पर शहर जाकर अस्पताल में भर्ती हुई और अस्पताल में साफ-सफाई का काम करने के साथ अन्य कुष्ठ रोगियों की मरहम पट्टी भी करती रही। इसी दौरान सिलाई-कढ़ाई सीख कर खुद को काबिल बनाया। हिम्मत नहीं हारी, पढ़ाई  कर नर्सिंग सीखी। पूरी तरह से ठीक होने पर ही परिवार, समाज ने उसे अपनाया।

        "कुष्ठ  रोग  लाइलाज नहीं है, सोनाबाई के इस लम्बे संघर्ष को देख 'लेखक मन डॉक्टर' ने जब उसे अपने उपन्यास के पन्नों में संजोया तो उस वास्तविक जीवन पर आधारित उपन्यास से प्रेरित हो एक फिल्मकार ने एक 'लघु-फिल्म' बना दी। 
       फिर अकेले संघर्ष करती हुई उस कुष्ठ रोगी पीड़िता के जीवन की कहानी को 'अंतर्राष्ट्रीय फिल्म-समारोह' में दिखाए जाने के लिए चुना गया।"

    अब उसी फिल्म को गाँव-गाँव दिखाया जा रहा है। जिसमें सोना बाई भी अपनी बीमारी के साथ रिश्तों की असलियत को बताते हुए दिखाई दे रही थी। 

     "रिश्ते तो फूलों की तरह होते हैं। उनकी खूशबू बरकरार रखने के लिए  प्रेम, लगाव,  स्नेह से सींचते रहना चाहिए, न कि खरपतवार की तरह निकालकर फेंक देना चाहिए।" 
        बोलते हुए सोना बाई के आँसू छलक पड़ते हैं। संघर्ष भरी उस फिल्म को देखते हुए जहाँ गाँव वाले ताली बजा रहे थे। वहीं मानसिक कुष्ठ रोगी पति शर्म से जमीन में गड़ा जा रहा था और 'सोना बाई' हमेशा के लिए सुर्खियों में कैद हो गयी थी। 

डॉ. क्षमा सिसोदिया 




प्रकाशन 

उपरोक्त रचना 2018 में लिखी गयी है।
यह पूर्णतः अप्रकाशित, अप्रसारित रचना है।
यह रचना मुझे इसलिए बहुत पसंद है, क्योंकि इसमें एक साथ कई संदेश समाज को प्रेषित हो रहे हैं।
उदाहरणार्थ -
(1)  कुष्ठ रोग लाइलाज नही है।
( 2) मुसीबत के समय रिश्ते को मत तोड़ो।
 ( 3 ) औरत को कमज़ोर मत समझो।
( 4 ) दूसरे की सेवाओं का परिणाम खुद का जीवन सँवारना है। 

डाॅ. क्षमा सिसोदिया 
10/10 सेक्टर बी महाकाल वाणिज्य केन्द्र 
उज्जैन 456010