शुक्रवार, 11 जून 2021

मेरी पसंदीदा लघुकथा (03) नमिता सचान सुंदर

 



          उक्त शृंखला के अंतर्गत नमिता सचान सुंदर द्वारा प्रस्तुत लघुकथाएँ 

पेंशन लघुकथाकार डॉक्टर सुमति अय्यर 

रिश्ते लघुकथाकार नमिता सचान सुंदर 

प्रकाशन 


          अपनी पसंद की किसी एक रचनाकार की एक कथा का चयन करना अत्यंत दुरूह कार्य है।  तथापि इस श्रेणी के अंतर्गत हम यहां डा. सुमति अय्यर द्वारा रचित लघुकथा ‘पेंशन’ साझा करना चाहेंगे। डा. अय्यर 70-80 के दशक का एक सशक्त हिंदी हस्ताक्षर थीं। संबंधित लघुकथा सचिन प्रकाशन, ( प्रकाशक – अनिल पालीवाल) की सचिन कोशमाला के अंतर्गत प्रकाशित हिंदी लघुकथा कोश (प्रथम संस्करण -1988) में प्रकाशित हुई थी। जिसका संपादन माननीय बलराम जी द्वारा किया गया था। सुमति अय्यर की इस लघुकथा का रचना काल 1987 है। कथा के बाद हम बतायेंगे कि हमने इस कथा का चयन क्यों किया। 

लघुकथा 

पेंशन 

        उनकी पेंशन सहसा बंद हो गयी थी। घर की गाड़ी चरमराने लगी। डाक की गड़बड़ी के भ्रम में दो माह निकल गए। बेटे-बहू की भुनभुनाहट से तंग आकर वे पेंशन दफ्तर पहुंचे। पता लगा सरकारी कागजों के अनुसार वे गोलोकवासी हो चुके हैं। लिहाजा पेंशन बंद। वे तर्क करते रहे, गिड़गिड़ाते रहे। कहा गया यदि वे अपने जीवित होने का प्रमाण पत्र दें, तो उस पर विचार होगा। प्रमाण पत्र मिलना आसान नहीं था। वे जहां संभव था आंसुओं से, कहीं नोटों से काम निकालते रहे। घर में बेटे-बहू की झल्लाहट अलग से। बंधी-बंधाई रकम जो पांच माह से नहीं मिल रही थी सो एक वक्त की रोटी बंद।

          किसी तरह फाइल ने तृप्त हो कर डकार ली और आश्वासन मिला की अगले माह से पेंशन दरवाजे पर पहुंचेगी। उछाह में लौट रहे थे कि गड्ढे में पैर पड़ गया और हड्डी तुड़वा बैठे। दर्द से बिलबिलाते रहे पर बेटा घरेलू इलाज करता रहा। पंद्रहवें दिन वे सचमुच गोलोक सिधार गए।

      मनीऑर्डर आया अगले माह। लौटा दिया गया। बेटा खीझ गया। ‘मरने की जल्दी पड़ी थी। पेंशन ले कर मरता बुड्ढ़ा।‘

       अगले माह डाकिए की घंटी टन टनाई। 

      ‘कोई पुराना बकाया...’ 

बेटे ने लपक कर खाकी सरकारी लिफाफा खोला। फाइल के मुंह ने बंद होने से पहले मृत्यु प्रमाण पत्र की मांग की थी।

डॉक्टर सुमति अय्यर                         

अभिमत 

      कहा जाता है कि साहित्य अपने रचना काल का ऐतिहासिक दस्तावेज भी होता है और जब बात भावना के स्तर की हो तो देश काल की सीमा से परे सार्वभौमिक होता है तो इस कथा में भी चंद शब्दों में ये दोनों ही बातें पूरी तरह उतारने में लेखिका सफल रही है। पेंशन का मनी ऑर्डर से आना, किसी भी कार्य के लिए दफ्तरों का चक्कर लगाना और अपने ही जीवित होने का प्रमाण जुटाने का त्रास, उस दशक के सत्य हैं। खाकी लिफाफे में सरकारी कागज आदि भी इतिहास ही है। आज ऑनलाइन अंतरण, बिल जमा आदि के जमाने में इसकी कल्पना भी दुरूह है। आधार कार्ड, पैन कार्ड जैसे प्रमाणिक परिचय प्रमाण पत्रों से लैस आज का युवा सोच भी नहीं सकता कि ऐसा भी हो सकता है कि खुद के जीवित रहने का प्रमाण पत्र जुटाने के लिए किसी को अन्य         आधिकारिक श्रोतों के सम्मुख गिड़गिड़ाना पड़े। हर काल के अपने अलग दर्द और दंश हुआ करते हैं। बहुत कुछ बदल गया है। हां नहीं बदला है तो मानवीय संबंधों में रचा-बसा घिनौना स्वार्थ, संवेदनहीनता। और विसंगति, विडंबना का जो मारक प्रयोग है इस कथा में वह कथा के शिल्प को उभार देता है। कुछ ही शब्दों में इतना कुछ समेटे होने के कारण तथा प्रभावी रूप से संप्रेषित करने के कारण ही हमें यह कथा अत्यंत प्रिय है।

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लघुकथा 

रिश्ते 

      “लो देखो, सूरज सिर पर आ खड़ा हुआ है और महारानी की अभी दोपहर के खाने की तैयारी ही शुरू नहीं हुई।" धुले बर्तनों का झौव्वा उठा ले जाती छोटी चाची को देख, दादी फिर कर्कश आवाज में शुरू हो गयीं थीं।

       खुले आंगन में टापू खेलती मुन्नी अचानक रुक गयी फिर पता नहीं क्या सोचती धीरे धीरे चलती दादी के पलंग के पास आ खड़ी हुई।

       “दादी आप छोटी चाची पर हमेशा चिल्लाती क्यों रहती हैं?”

     अब मुन्नी ठहरी दादी के सबसे कमाऊ पूत और साक्षात लक्ष्मी बहू की इकलौती दुलारी बेटी तो दादी मन करे तो भी भला कैसे झिड़क सकती थी उसे। आवाज में सायास मिश्री घोलती बोलीं, “अरे बिटिया तुम न समझोगी। इस कुलच्छनी ने पैर धरे नहीं आंगन में कि खा गई तुम्हारे छोटे चाचा को।“

     “खा गयी?”, मुन्नी की आंखें असमंजस में भर थोड़ी बड़ी हो गयीं। 

       “अरे, चले गये न तुम्हारे चाचा हम सबको छोड़,” बोली दादी जैसे विलाप में चिल्लाती सी

      “अच्छा.”........ क्षणांश को सोच में डूबी सी खड़ी रही मुन्नी फिर दादी के चेहरे पर आंखें गड़ा कर बोली

      “पर बुआ भी तो फिर फूफा जी को खा कर आयीं हैं.....”

       और अपने से चिपका कर बैठायी बिटिया के सिर पर तेल ठोकने को जाता दादी का हाथ हवा में रुका रह गया। 

अभिमत 

यह कथा हमें सर्वाधिक प्रिय है क्यों कि इसे कथादेश अखिल भारतीय लघुकथा प्रतियोगिता - 12 में पुरस्कृत किया गया था। 

कथा लघुकथा. कॉम में भी प्रकाशित हो चुकी है। 




नमिता सचान सुंदर 

5/138, विकास नगर 

लखनऊ- 226022 

मो- 7985281674