उक्त शृृंखला के अंतर्गत श्रीमती कनक हरलालका की प्रस्तुति। आंदोलन के भी अलग अलग कारण हो सकते है। पढ़िए
"इन्दुमति श्री स्मृति लघुकथा विधा सम्मान योजना" के अन्तर्गत मैं अपनी पसंदीदा दो लघुकथाएं भेज रही हूँ। एक मेरी स्वयं रचित मौलिक लघुकथा "अधूर सच" है एवं एक आदरणीय बलराम अग्रवाल सर की लघुकथा "बिना नाल का घोड़ा " है ।
कनक हरलालका
प्रस्तुत है मेरी पंसदीदा लघुकथा "अधूरा सच"
मेरी यह रचना मेरी पसंदीदा लघुकथा में से एक है।
आज गरीबी और अमीरी के मध्य खिंची हुई विभाजन रेखा इतनी स्पष्ट और प्रबल हो गई है कि अमीर अपने दिखावे की जिन्दगी जीने के लिए गरीब व्यक्ति द्वारा दुगुनी कीमत देकर भी काम करवाने में हिचकता नहीं है । गरीब व्यक्ति विवशता वश अपनी रोजी रोटी की आवश्यकता की पूर्ति होते देख इसे अपनी तकदीर समझ कर सहर्ष स्वीकार ही नहीं करता बल्कि आने वाले भविष्य में भी इस विभाजन को स्वीकार करने के लिए तैयार है।
वर्तमान किसान आंदोलन के माध्यम से वर्तमान समय की विसंगतियों को उजागर करती हुई यह लघुकथा मुझे इसलिए भी बेहद पसंद है क्योंकि लघुकथा समाज के विभिन्न स्वरूपों के वैमनस्य को प्रस्तुत करती हुई जो सच दिखलाई पड़ता है उसके पीछे छिपे हुए अधूरे सच को भी प्रकट करती है।
प्रकाशन
यह लघुकथा सोशल मीडिया के पेपरविफ मंच व फेसबुक के विभिन्न लघुकथा समूहों में यथा क्षितिज, साहित्य संवेद, लघुकथा के परिंदे, नया लेखन नए दस्तखत आदि में प्रकाशित होने के साथ क्षितिज के ई-लघुकथा सम्मेलन के मंच पर पढ़ी भी जा चुकी है ।
लघुकथा
अधूरा सच
मैं अपने न्यूज चैनल मीडिया ग्रुप की तरफ से मसाले की खोज में किसान आन्दोलन का सच जानने जा पंहुचा था वार्डर पर बैठे किसानों के गाँव।
कुछ तो टेढ़े मेढ़े रास्तों और कुछ रास्तों में उमड़ी भीड़ के कारण वहाँ पंहुचने में रात हो गई थी।
देखा तो एक किसान रात में भी खेतों में व्यस्त था। मुझे और क्या चाहिए था। जा पंहुचा उसके पास।
"अरे भाई क्या आप किसान नहीं है?"
"खेती कर रहा हूँ तो किसान ही हूँ न..!"
"नहीं.. आप किसान आन्दोलन में हिस्सा नहीं ले रहे हैं न.. किसान तो सब बार्डर पर आन्दोलन पर बैठे हैं..।"
"वो अमीर किसान हैं मैं गरीब किसान हूँ।"
"अच्छा.. ये बतलाएं आप रात में खेत में क्यों हैं?"
"दिन में उन किसानों के खेत में काम करता हूँ। मेरे अपने खेत में तो मुझे रात में ही समय मिलता है काम करने का.."
"तो क्या आप इस किसान आन्दोलन के चलते रहने का समर्थन करते हैं ?"
"जी..बिलकुल करता हूँ।"
"क्या कारण है इस समर्थन का? क्या आपको लगता है इससे भविष्य में आपको बेहतर रोजगार उत्पादन में सहायता मिलेगी?"
"भविष्य का तो पता नहीं पर वर्तमान में मेरी रोजी रोटी का जुगाड़ इन किसानों के खेतों पर चौगुने दामों पर काम करने से हो रहा है।"
कनक हरलालका
मेरी पंसदीदा लघुकथा आदरणीय बलराम अग्रवाल जी की लघुकथा "बिना नाल का घोड़ा"।
इस लघुकथा में आज के समय में मध्यमवर्गीय मनुष्य का जीवन कितना संघर्षमय हो गया है इसका चित्रण है। वह घर, परिवार, ऑफिस सब जगह बस केवल काम के अतिरिक्त दबाव में दौड़ता ही रहता है। यहाँ तक कि रात में बिस्तर में भी उसे चैन नहीं है। काम के दबाव में उसे सपने में भी घोड़े के समान घर, परिवार, बॉस सबको अपने ऊपर लदा महसूस कर कार्य रूपी दबाव में दौड़ते हुए महसूस होता है।
अभाव की छोटी चादर से बाहर फैले हुए घायल पाँव (नाल बिना घिसे हुए) भी उसकी गरीबी और तंगहाली के प्रतीक रूप में बहुत सुन्दर प्रस्तुतिकरण है।
आज मध्यमवर्गीय मनुष्य बिना नाल के (बिना सुरक्षा एवं सुविधा के) घोड़े के समान निरन्तर परिवार के पालन पोषण के लिए काम के अतिरिक्त दबाव में दौड़ता ही रहता है दौड़ता ही रहता है।
कथा की मार्मिकता उसका बेहतरीन पक्ष है। शिल्प की दृष्टि से भी यह लघुकथा मेरी पसन्दीदा लघुकथाओं में स्थापित है।
प्रकाशन
मैंने यह लघुकथा दिशा प्रकाशन की पड़ाव और पड़ताल की लघुकथा शृखला के खंड 2 से उद्धृत की है ।
बलराम अग्रवाल
लघुकथा
बिना नाल का घोड़ा
उसने देखा कि ऑफिस के लिए तैयार होते होते वह चारों हाथ- पैरों पर चलने लगा है। तैयार होने के बाद वह घर से बाहर निकला। जैसे ही सड़क पर पहुंचा, घोड़े में तब्दील हो गया। अपने जैसे ही साधारण कद और काठी वाले चमकदार काले घोड़े में। मां, पिता, पत्नी और बच्चे- सबको उसने अपनी गर्दन से लेकर पीठ तक लदा पाया। इससे पहले कि वह कुछ समझ पाता, सड़ाक् से एक हण्टर उसके पुट्ठे पर पड़ा, " देर हो चुकी है, दौड़ो...!"
वह दौड़ने लगा... ठकाठक... ठकाठक... ठकाठक... ठकाठक।
" तेज...और तेज...!" ऊपर लदे लोग एक साथ चिल्लाए ।
वह और तेज दौड़ा -- सरपट।
कुछ ही देर में उसने पाया कि वह ऑफिस के सामने पहुंच गया है। खरामा - खरामा पहले वह लिफ्ट तक पहुंचा , लिफ्ट से फ्लोर और फ्लोर से सीट तक। ठीक से वह अभी सीट पर बैठा भी नहीं था कि पहले से सवार घरवालों को पीछे धकेल कर बॉस उसकी गर्दन पर आ लदा।
"यह सीट पर बैठ कर आराम फरमाने का नहीं , काम से लगने -लिपटने का समय है मूरख ! दौड़...।"
उसके पुट्ठों पर,गरदन पर, कनपटियों पर संटी फटकारता वह चीखा।
उसने तुरंत दौड़ना शुरू कर दिया इस फाइल से उस फाइल तक उस फाइल से उस फाइल तक... लगातार... लगातार ... और दौड़ता रहा तब तक जब तक कि अपनी सीट पर डह ना गया पूरी तरह पस्त होकर।
एकाएक उसकी मेज पर रखें फोन की घंटी घनघनाई ट्रिंग- ट्रिंग –ट्रिंग-ट्रिंग... ट्रिंग...!
उसकी आंख खुल गई।
हाथ बढ़ाकर उसने सिरहाने रखें अलार्म- पीस को बंद कर दिया और सीधा बैठ गया ।
पैताने पर , सामने उसने माँ को बैठे पाया । "नमस्ते माँ!" आंखें मलते हुए माँ को उसने सुबह की नमस्ते की।
" जीते रहो!" मां ने कहा "तुम्हारी कुंडली कल पंडित जी को दिखलाई थी। ग्रह दशा सुधारने के लिए तुम्हें काले घोड़े की नाल से बनी अंगूठी अपने दाएं हाथ की उंगली में पहननी होगी।"
मां की बात पर वह कुछ ना बोला ।
"बाजार में बहुत लोग नाल बेचते हैं ।" मां आगे बोली, "लेकिन उनकी असलियत का कोई भरोसा नहीं है। बैल भैंसा किसी के भी पैर की हो सकती है।... मैं यह कहने को आई थी कि दो चार जान पहचान वालों को बोलकर काला घोड़ा तलाश करो ताकि असली नान मिल सके।"
" नाल पर अब कौन पैसे खर्चे करता है माँ!"
मां की बात पर वह कातर स्वर में बुदबुदाया, "हंटरों और चाबुकों के बल पर अब तो मालिक लोग बिना नाल ठोके ही घोड़ों को घिसे जा रहे हैं...।" यह कहते हुए अपने दोनों पैर चादर से निकाल कर उसने मां के आगे फैला दिए, " लो देख लो!"
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