बना के क्यों बिगाड़ा रे ..........
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अक्सर बनाती हो तुम,
समंदर के किनारे,
गीली रेत से,
पेड़ / पर्वत / नदिया / घर / आदमी / औरत,
और भी बहुत कुछ .......
फिर ! अचानक न जाने किस उधेड़ - बुन में
जो कभी समानेवाला है, समंदर के आगोश में,
जिसे समंदर की लहरे बहाने ही वाली है,
उसे, अपने ही हाथों-हाथ गिरा - मिटा देती हो,
समंदर में बहा देती हो, विसर्जन कर देती हो,
क्यों?
क्या होती है तुम्हारी मंशा ?
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* उदय श्री. ताम्हणे
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