सोमवार, 14 जून 2021

न जानें क्यों


 बना के क्यों बिगाड़ा रे ..........

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अक्सर बनाती हो तुम, 

समंदर के किनारे, 

गीली रेत से, 

पेड़ / पर्वत / नदिया / घर /  आदमी / औरत, 

और भी बहुत कुछ  .......

फिर ! अचानक न जाने किस  उधेड़ - बुन में 

जो कभी समानेवाला है, समंदर  के आगोश में, 

जिसे समंदर की लहरे बहाने ही वाली है, 

उसे, अपने ही हाथों-हाथ  गिरा - मिटा देती हो, 

समंदर में  बहा देती हो,  विसर्जन कर देती हो, 

क्यों? 

क्या होती है तुम्हारी मंशा ? 

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* उदय श्री. ताम्हणे 

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