शनिवार, 12 जून 2021

मेरी पसंदीदा लघुकथा (07) मृणाल आशुतोष

 


         उक्त शृंखला के अंतर्गत मृणाल आशुतोष द्वारा प्रेषित लघुकथाएँ 

        संतान (मृणाल आशुतोष) में लेखक ने नायक राम प्रसाद के अंतर्द्वंद का कुशलतापूर्वक पाठको से साक्षात्कार कराया गया है। 

          जब द्रौपदी नंगी नहीं हुई (युगल किशोर) में लेखक ने दर्शकों की मानसिकता पर गहरा कटाक्ष किया गया है। 

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         इंदुमती श्री स्मृति लघुकथा विधा सम्मान योजना के अंतर्गत मैं दो लघुकथाएँ प्रेषित कर रहा हूँ।


लघुकथा 
संतान

          बादल गरजने के साथ ही दिल की धड़कन तेज़ हो गयी। राम प्रसाद ने पत्नी की ओर देखा और पत्नी ने आशा भरी नजरों के साथ आकाश की ओर! कोई और दिन होता तो भगवान से मनाती कि जम कर बरसो और खूब बरसो पर अभी...
         ब्रह्म बाबा से लेकर छठी मैया तक, सबसे बारिश रोकने का गुहार लगा रही थी।
         तीन दिन से बुखार में तप रहा था एकलौता बेटा! डॉक्टर से उसे दिखाकर अस्पताल से लौट रही थी रमसखिया। घर से एक कोस पहले ही उतार देता है टेम्पो। रास्ता है ही इतना अच्छा कि टेम्पो क्या रिक्शा वाला भी उधर नहीं जाना चाहता। पचास रुपये दे दो, तब भी नहीं।
           घर की चिंता भी खाये जा रही थी। पता नहीं, कैसे होगी चारों बहन! हीरा और मोती भी मुँह उठाये बाट जोह रही होंगी। 

"ला बौआ तो मुझे दे! और तेज़ चल वरना पक्का भींग जायेंगे।" 

"भगवान एकाध घण्टे पानी रोक नहीं सकते क्या? अगर मेरे लाल को कुछ हो गया तो क्या करूंगी?"
          तेज़ बूँदों का टपकना शुरू हो गया था। रामप्रसाद ने फटाक से कुर्ता खोलकर बेटे को लपेट लिया और दौड़ लगा दी।
          अब बारिश की छींटे और तेज़ हो गयी। बच्चा रोने लगा। वह भगवान का नाम लेकर चीखा,"हे भगवान! पानी रोक दो।"
          तभी उसे दरार वाली सूखी खेतें दिख गयीं जिनमें धान की फसल अपने मौत का इंतज़ार करती हुई नज़र आ रही थी।
          एक पल को वह ठिठका, और ....अबकी वह और ज़ोर से चीखा,"बरसो। और बरसो। और खूब बरसो। बरसते रहो।" 

मृणाल आशुतोष 


प्रकाशन 
          यह कथा वागार्थ पत्रिका और  'लघुकथा में किसान' संकलन में प्रकाशित हो चुका है। 
दो वर्ष पूर्व जब लघुकथा में किसान हेतु रचना आमंत्रित की गई थी तब मैं इस हेतु एक अच्छे कथ्य की तलाश में था। मैंने करीब 30 लघुकथाएँ पढ़ डाली। मैं लीक से अलग कुछ ढूँढ रहा था। अंतिम तिथि नज़दीक आ गयी थी। पर मैं लिख न पा रहा था। इस विषय पर सोच रहा था कि बारिश होने लगी। तभी मुझे 15 साल पहले की एक घटना याद आयी जिसमें एक पुरुष अपने बच्चे को भींगने से बचाने के लिए गमछा ओढ़ा देता है। फिर इस कथा का सृजन हुआ। 
अभिमत 
           यह कथा किसान की वास्तविक स्थिति का चित्रण करने का प्रयास है जिसमें वह अपनी संतान और अनाज के पौधे को समान समझता है। 



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लघुकथा 
युगल किशोर 
जब द्रौपदी नंगी नहीं हुई 


           मेले में मनोरंजन के बीसों साधन थे। थिएटर, नाच पार्टियाँ, नाटक मण्डलियां थी। थिएटर पुलिस के हेलमेल से एक आइटम रखते थे कैबरे। भीड़ उधर ही ज्यादा जुटती। नाटक-मंडली वाले धार्मिक पौराणिक खेल दिखाते लेकिन दर्शकों की संख्या संतोषजनक ना रहती।

        प्रभात रंगशाला वाले उस दिन "द्रौपदी चीरहरण" खेल रहे थे। वैसा न तो कोई प्रचार था न कोई ढिंढोरा लेकिन हवा में बात तैरने लगी कि द्रौपदी का पार्ट पंचम बाई करेगी। पंचम बाई बीस-बाइस साल की गदराई जवानी वाली मोमी मूरत है, परीस्तान की परी है, जन्नत की हूर है। दुःशासन चीर खींचेगा और द्रौपदी को एकदम नंगी कर देगा। साफ नंगी। दर्शकों के रूबरू बिना ब्लाउज पेटीकोट के। साड़ी लेकर कृष्ण जानबूझ कर तुरन्त नहीं आएंगे। 
         प्रभात रंगशाला का शामियाना वाला हॉल हॉउसफुल। दर्शक बैठे थे, बहुत लोग अगल-बगल पीछे खड़े थे। लेकिन बुकिंग काउंटर पर भीड़ कम नहीं हो रही थी। 
          जुए वाला सीन शुरू हुआ। दर्शक बेसब्री से पांडवों के हारने और द्रौपदी को लाए जाने का इंतज़ार कर रहे थे। खीझ बढ़ती जा रही थी कि बेकार की बातों में सीन को नाहक लम्बा किया जा रहा है। 
           आखिर वह सीन आया। दुःशासन ने  द्रौपदी को नेपथ्य से खींचकर,  घसीटकर लाकर खड़ा कर दिया। उत्तेजित द्रौपदी भीष्म को सम्बोधित कर कोई संवाद बोल रही थी। लोगों के कान आँखों में आ गए थे। पंचम बाई, जो मंच पर एक वस्त्र में खड़ी थी, उसके बाल खुले थे। बालों के बीच उसका सुंदर मुखड़ा उसकी सुपुष्ट मांसल छातियाँ जो मात्र आँचल से ढकी थीं। मंच पर तेज प्रकाश में लोग यही देख रहे थे, सुन कुछ नहीं रहे थे। प्रकाश का आयोजन ऐसा था कि झीनी साड़ी में द्रौपदी की जाँघों का अक्स आ रहा था। एक सनसनी भरा इंतज़ार था। बेसब्री कि डायलॉग नहीं, एक्शन, चीर-हरण।

           लोगों की आवाज़ें आने लगीं-  "खींचो चीर खींचो।" सिनेमा और टीवी के चैनलों ने जो दर्शक की मानसिकता तैयार की है, उसका स्पॉट प्रदर्शन होने लगा। दुःशासन की भुजाएं फड़कीं। उसने द्रौपदी के आँचल की ओर हाथ बढ़ाए। द्रौपदी ने बाहों में अपनी छातियाँ छिपायीं। चीखी, चिल्लाई। इज्जत की दुहाई दी। दुःशासन ने ठहाका लगाया और द्रौपदी के पीछे जा कर आँचल खींचना शुरू कर दिया। ड्रामा वालों की अपनी तकनीक थी। साड़ियां खिंचती गयीं-  एक.. दो.. दस.. कृष्ण ऊपर से साड़ियाँ बढ़ा रहे थे। दुःशासन थक गया। उसने आए पसीने को कपाल पर से पौंछा। द्रौपदी नँगी नहीं हुई।

         लेकिन दर्शक नंगे हो गए। जो कुछ देखने आए थे नहीं दिखा। भारी हरबोंग मच गया। मंच पर रोड़े-पत्थर फेंके जाने लगे। चूंकि आग बुझाने की कोई ठीक व्यवस्था नही हो सकी, इसलिए प्रभात रंगशाला जल कर राख हो गयी। 

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प्रकाशन 
          लघुकथा 'जब द्रौपदी नंगी नहीं हुई' वरिष्ठ लघुकथाकार दिवंगत युगल किशोर की है। यद्यपि कथा का रचनाकाल करीब तीस वर्ष पूर्व का है। तथापि कथा के माध्यम से आजकल के समाज की मानसिकता का सटीक चित्रण किया है। 
अभिमत 
            लोग द्रौपदी चीरहरण के लिये दुर्योधन से लेकर पांडव को और धृतराष्ट्र से लेकर भीष्म तक को दोषी मानते हैं पर अपने अंदर के दुर्योधन-दुःशासन को नहीं मारते। द्वापर युग से कलयुग तक दुर्योधन-दुःशासन की संख्या में बहुत बढोत्तरी हुई है। बस मौका मिलने की देर है। हर युधिष्ठिर दुःशासन हुआ चाहता है।
       रंगशाला में 'द्रौपदी चीरहरण' का मंचन है आज। और प्रचलित कथा के विपरीत कृष्ण द्रौपदी की लाज नहीं बचाएंगे, ऐसी खबर सबके पास पहुँच चुकी थी। सुंदरता और कामुकता की प्रतिमूर्ति पन्चम बाई को नि:वस्त्र देखने की आतुरता और व्याकुलता भीड़ को बेचैन कर रही थी। क्लाइमेक्स आते ही लोगों का सब्र जाता रहा और सब चीख पड़े," खींचो, चीर खींचों।" 
         पर एक बार फिर कृष्ण ने सबको चकमा दे दिया। दर्शक जो वह देखना चाह रहे थे, वह नहीं मिल सका तो रंगशाला में आग ही लगा दी। यह समाज के उस उग्र रूप का परिचायक है जो अपनी इच्छापूर्ति न होने पर कुछ भी करने को तैयार हो जाता है।
प्रस्तुत कथा में समाज का वास्तविक चित्रण कर लेखक ने इसे सार्थकता प्रदान की है। 

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मृणाल आशुतोष
द्वारा- श्री तृप्ति नारायण झा
ग्राम+पोस्ट- एरौत(वार्ड नं 5)
भाया-रोसड़ा
जिला-समस्तीपुर (बिहार)
पिन-848210
मोबाईल: 91-8010814932