लघुकथा के विकास में लघुकथा की श्रेष्ठ पुस्तकों का कोई विकल्प नहीं है ! फेसबुक पर चल रहे विभिन्न लघुकथा-समूह पुस्तकों के कभी भी विकल्प नहीं हो सकते हैं ! फेसबुक जैसे माध्यम के समूहो पर एक आम पाठक जितनी बेबाक़ी से अपनी राय रख सकता है, आलोचना कर सकता है, वैसा पुस्तकों के मामले मे तो नहीं है न ? मै समझता हूँ, तात्कालिक की गई टिप्पणिया स्वाभाविक, सत्यता के अधिक निकट होती है ! सादर वंदे !
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