बुधवार, 16 जून 2021

लघुकथा डरपोक , असमंजस

 





डरपोक  

लघुकथा 

उदय श्री. ताम्हणे 


         मैं घर से बाहर निकला ही था, की दो व्यक्ति मेरे सामने से भागते हुये निकले! दोनों के हाथ मे कृपाण थी! 

        वे किसी बात पर झगड़ा करने के बाद अब एक दूसरे की जान के दुश्मन बन गए थे!

         एक - एक करके मकानो के दरवाजे बंद हो रहे थे! 

         पूरा दृश्य मेरे सामने किसी फिल्म की शूटिंग की तरह चल रहा था! 

            मैं देखता हूं! एक व्यक्ति के पेट मे कृपाण की घातक चोट लग गई है! वह जमीन पर गिरकर तड़पने लगा है! 

            दूसरा उसे छोड़ कर भाग रहा है!

            तभी मुझे पुलिस की जीप आती हुई दिखाई पड़ती है!

             पुलिस के भयावह साक्षात्कार की कल्पना करके, मैं पलक झपकते ही गली में मुड़कर, अपने घर आ जाता हूँ। 


भोपाल मध्यप्रदेश भारत 


रचना काल 1981 

******लघुकथा******

 ***** उदय श्री ताम्हणे 

******असमंजस*****


" ताजा खबर , अख़बार ले लो सेठ जी ! " 

 " ठीक है एक रुपया दूंगा ! " 

 " दो रूपये का है ! " 

 " मै जानता हूँ , तुझे तो ये कंपनी से मुफ़्त मिलते है ! " 

 " तू कामचोरी तो नहीं कर रहा सो ले लेता हूँ , वार्ना लेता भी नहीं ! " 

 " एक रुपया लेकर , अख़बार देकर लड़का चलता बना " 

अख़बार लिया है तो पढ़ना भी चाहिए .... ....... न ! 

पहला पेज उप चुनाव में सत्ता पक्ष की करारी हार ! 

दूसरा पेज असहिष्णुता पर प्रदर्शन ! 

तीसरा पेज एटीएम से गिरोह ने रूपये निकाल लिए ! 

चौथा पेज महिला का मंगलसूत्र ले कर भागे लुटेरे ! 

सेठ का मन कसेला हो गया ,अख़बार को मोड़कर वह बुदबुदाया क्यों ले लिया मैने यह अखबार ! 


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