शनिवार, 17 जुलाई 2021

 लघुकथा 

मोहब्बते 

             जीता भी था उसके लिए, मरता भी था उसके लिए।  "वह" वायरस की काली करतूत का शिकार हो गई थी। एक-एक दिन बरस के समान हुए जा रहे  थे। ठंड में भी पसीना आ जाता था। 

        मोबाइल ऑन कर वह बोली- "मैं न रहूँगी विवेक। लेकिन तुम्हें वादा करना होगा कि  तुम फिर से विवाह करोगे।" 


          "नहीं। मैं तुम्हारी यादें  भूलाकर न जीना चाहूंगा, न जी सकूँगा।" 


         "तुम्हें जीना होगा विवेक। ,,,,,,,,,  

हमारे बेटे के लिए।" 


           "हाँ। यदि मुझे जीना  होगा तो तुम्हें भी जीना होगा।  मेरे लिए।" 


           "वह"  पलटकर गहरी साँस भीतर रोककर धीरे - धीरे  छोड़ने लगी। 

          वायरस की हार नजदीक  थी। 




उदय श्री ताम्हणे 

भोपाल मध्यप्रदेश