लघुकथा
मोहब्बते
जीता भी था उसके लिए, मरता भी था उसके लिए। "वह" वायरस की काली करतूत का शिकार हो गई थी। एक-एक दिन बरस के समान हुए जा रहे थे। ठंड में भी पसीना आ जाता था।
मोबाइल ऑन कर वह बोली- "मैं न रहूँगी विवेक। लेकिन तुम्हें वादा करना होगा कि तुम फिर से विवाह करोगे।"
"नहीं। मैं तुम्हारी यादें भूलाकर न जीना चाहूंगा, न जी सकूँगा।"
"तुम्हें जीना होगा विवेक। ,,,,,,,,,
हमारे बेटे के लिए।"
"हाँ। यदि मुझे जीना होगा तो तुम्हें भी जीना होगा। मेरे लिए।"
"वह" पलटकर गहरी साँस भीतर रोककर धीरे - धीरे छोड़ने लगी।
वायरस की हार नजदीक थी।
उदय श्री ताम्हणे
भोपाल मध्यप्रदेश
