लघुकथा
सपनों की बहु
हजारों रंग के सपने दिखा कर वह चला गया था। पत्नी माया के पास माया न थी। पुत्र मोह था, और बचे - खुचे कुछ सपने।
बेटा पढ़ाई कर अच्छी नौकरी पा गया था।
सपनों की रानी मंगेतर ने कहा- "अब हमें विवाह कर लेना चाहिए।"
बेटा यह सुनने के लिए व्याकुल था। लेकिन आशंकित भी था। मां के प्रति जो अखंड आदर भाव उसके ह्रदय में व्याप्त था। मंगेतर उससे अनभिज्ञ न थी।
उसने कहा - मैं तुम्हें वचन देती हूँ माँ को कभी शिकायत का मौका न दुंगी।" तेरी खुशी से खुशी, तेरे गम से गम की सार्थकता तो तभी है न?"
उसने प्रतिप्रश्न किया।
उदय श्री ताम्हणे
भोपाल मध्यप्रदेश
