रविवार का दिन था, लेकिन मैं कार्यालय में ही था। मोबाइल बजा तो मैंने रिसीव किया। आवाज आई "उदय भाई! मैं मधुदीप बोल रहा हूं। फिर हमारी लम्बी बातचीत हुई। वे "लघुकथा विश्व कोश" के लिए मैंने भेजी हुई सामग्री पर आश्वस्त होना चाहते थे। कभी मैंने उनकी एक लघुकथा का मराठी भाषा में अनुवाद किया था। उस पर भी वे आश्वस्त हुए। मेरे लिए यह सौभाग्य की बात थी। फोन लगाने में मैं फिसड्डी हूं ही सो आगे उनसे बात नहीं हुई। लेकिन मेसेंजर पर यदाकदा मुलाकात होती थी। गिने चुने लोग हैं जिनकी फेसबुक पोस्ट मैं नियमित रूप से पढ़ता हूं। उनमें एक मधुदीप गुप्ता जी है। चार दिन से उनकी पोस्ट नहीं आई थी। मन व्याकुल हो रहा था। आज फेसबुक से ही पता चला वर्ष पूरा होने से पहले ही वे अपनी श्रीमती शकुन्त ( पत्नि) के पास चले गए हैं। हिंदी लघुकथा के चर्चित हस्ताक्षर मधुदीप को विनम्र श्रद्धांजलि।
ॐ शांति।