लघुकथा
प्रेम पर्वत
न जाने क्या हुआ कि सुचिता को सुमित प्यारा लगने लगा। वह सुबह - शाम , रात - दिन सुमित के खयालों में गुम रहने लगी। सुमित अपने केरियर से चिंतित था। जाॅब मिल जाता तो दो चार महीनों में किसी न किसी प्रकार से छूट ही जाता।
वह भीतर ही भीतर टूट रहा था।
सुचिता को जैसे पर्वत लांघना था। उसने अपनी सैलरी से रुपए जोड़े और सुमित के सामने विवाह का प्रस्ताव रखा। सुमित ने उसका प्रस्ताव ठुकरा दिया।
लेकिन सुचिता, सुमित के दिल की धड़कन में पहुंच चुकी थी।
उसने अपना दिल मजबूत किया और सुमित के घर गई।
सुमित के माता पिता ने उसका स्वागत किया।
सुचिता ने कहा "अंकल आंटी मुझे आप लोगों का साथ चाहिए। सुमित मेरे ह्रदय की धड़कन है। मेरे माता पिता और सुमित को हमारे विवाह के लिए तैयार करने की जिम्मेदारी मैं आप को सौंप रही हूँ।"
सुमित के माता पिता आश्चर्य चकित रह गए। उन्होंने कहा "सुचिता ! तुमने सुमित को ही पंसद नहीं किया वरन हमें भी चाहा है। इससे बड़ी दुनिया में खुशी की कोई बात नहीं हो सकती। तुम्हारी मनोकामनाएं अवश्य पूर्ण होगी।"
उदय श्री ताम्हणे
भोपाल मध्यप्रदेश
