शनिवार, 28 मार्च 2020

लघुकथा : मुफ्त

लघुकथा
मुफ्त

         बस स्टॉप पर बस रुकी ! विभूति जी बस में सवार हुए ! विभूति की नजरे खाली सीट खोज रही ह
बस भरी हुई है ! अब विभूति ने अनुमान लगाया बायें कोने में चिरपरिचित नाटे कद वाले आदमी के बगल वाली सीट खाली होगी !
       विभूति जी का अनुमान सही निकला और वे उस खाली सीट पर जाकर बैठ गए !
"ठक-ठक"
बस का परिचालक सवारियो से किराया वसूल रहा है !
     चूंकि इस बस द्वारा प्रतिदिन आने जाने वाले लोग है ! अतः बस मालिक ने सवारियो को टिकट देने का प्रावधान नहीं रखा है !
१६ -१७ वर्षीय लड़के को परिचालक का काम सौपा है, उसका ध्यान चारो ओर है ! अगले स्टाप से उसे सावरिया भी लेना है !
"ठक -ठक"
          वह परिचालक विभूति जी के पास आता है ! वे उसे २० रूपये का नोट थमा देते है ! उनके पास बैठे वह नाटे कद काठी के महोदय भी जेब से रूपये निकालते है !
" अरे ! वह तो आगे बढ़ गया !" कह कर वे तुरंत रुपए जेब में रख लेते है !
विभूति जी प्रश्नवाचक दृष्टी से उन्हें घूर रहे है !
       वे महोदय खिसिया गए है !
बाहर बादल घुमड़ -घुमड़कर टिप -टिप टापुर टुपुर बरसने लगे है ! बस में उमस से राहत मिल गयी है !

*उदय श्री. ताम्हणे