शनिवार, 7 नवंबर 2020

लघुकथा : भरोसा

 लघुकथा 

 भरोसा 


'अरे ! वीरू की माँ, काहे फ़िकर करे हो ! तेरे पेट से जन्मा है, भरोसा रख बेटे पर !'

सज्जन सिंह ने अपनी पत्नी से कहा !

'ना ! अब न बचूंगी !'

वह पेट दर्द से कराह रही थी !

माता - पिता ने अपने बेटे का व्यवसाय ज़माने के लिए, पूरी ज़मीन बेच कर, राशि अपने बेटे को दे दी थी ! अब उनका आय को कोई साधन नहीं था !

    कुछ दिनों तक बेटे ने परवरिश की फिर न जाने क्या सूझी की मंदिर के पास एक झोपडी बना कर उन्हें वहां छोड़ आया !

      तब से वीरू की माँ की नींद उड़ गयी थी !

     सज्जन सिंह के ढाढ़स का उनकी पत्नी पर कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ा !

    'पेट का दर्द मेरी जान ले के ही छोड़ेगा ! खैराती अस्पताल वाले क्या समझे है ?'

     गैराज से गाड़ी निकालते हुए, वीरू ने माँ की आवाज सुन ली, खैराती अस्पताल का जिक्र आया तो उसके "हृदय में हलचल" हुई, डाक्टर से समय लिया ! 

वीरू झोपड़ी में आया और माँ से बोला " तैयार हो जा माँ !आयुष्मान अस्पताल में डॉक्टर श्रवण कुमार से चेकअप कराना है !"


उदय श्री. ताम्हणे 

भोपाल मध्यप्रदेश भारत