शनिवार, 12 जून 2021

मेरी पसंदीदा लघुकथा (04) मनोरमा पंत

 




उक्त शृृंखला के अंतर्गत प्रस्तुत है मनोरमा पंत  द्वारा प्रेषित लघुकथाएँ 

लघुकथा 
और गौरया जीत गई  

        बहुत दिनों से मेरे और गौरया के बीच झगड़ा चल रहा है । झगड़े की जड़ है। उसका घोंसला । वह मेरे शयनागार  में टँगी तस्वीर  के पीछे  घोंसला बनाना चाहती है ,जो मुझे कतई पसंद नहीं। पर वह मान नहीं रही है । जरा सी खिड़की  खुली नहीं कि मुहँ में तिनका दबाए , वह अंदर । मैंने उससे कहा-"यहाँ घोसला मत बनाओ ।
वह बोली - " क्यों न बनाऊँ  घोंसला? क्यों बुलाया वापिस?मैंने सिर झुका लिया । वह फिर बोलने लगी -
   पहले तो सबने मुझे भगा दिया। जंगल काट दिये, झाड़ियाँ तक साफ कर दी। छोटे मोटे पोखर , तालाब  पूर दिये ।नमभूमि पर खेती करने लगे , तो मैं क्या करती, खूब दूर चली गई ।
मैंने कहा -"हाँ गलती तो हुई  है। उसने फिर कहा-
फिर गौरया दिवस मनाने लगे, कविताऐं लिखने लगे , सकोरे में दाना पानी रखने लगे । अब आ गई हूँ , तो कह रही हो , घोंसला मत बना ।"
मैंने समझाया  -"बाहर झाड़ियों में बना ले"।
 वह बोली -  घनी झाड़ियाँ बची ही हैं कहाँ? और फिर बाहर  बिल्ली  कोरोना बनकर  घात में बैठी रहती है । मेरे बच्चों को खा जावेगी।"
मैं सिर थाम कर बैठ गई । देख  लिया कि वह नहीं मानेगी ।मानेगी क्या आधा घोंसला बना ही चुकी है । पँखे का अलग डर कि बच्चे उससे टकराकर मर न जाऐं। मैंने  कुछ सोचा और अब बरामदे को ही अपना शयनागार  बना लिया है। 

प्रकाशन 

   यह लघुकथा रामायण केन्द्र द्वारा  प्रकाशित  "लघुकथा  विशेषांक उर्वशी "2020"में प्रकाशित  हुई है। 

मेरी पसंद का कारण 
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मेरे आवास के पास खुली जगह पर सड़क किनारे पाँच बहुत पुराने बबूल के पेड़ थे , जिनपर लगभग 100/150 गौरया वर्षों से रह रही थी । पता ही नहीं चला और रहवासियों ने उन्हे  पूरा पूरा कटवा दिया असहाय गौरया वहाँ  से कहीं चली गई ।मुझे बड़ा दुख हुआ और लघुकथा का जन्म हो गया।     चाहती हूँ लघुकथा के माध्यम से समाज में चेतना आएऔर सोचे विकास के नाम पर हम क्या कर रहे हैं। 

मनोरमा पंत 


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लघुकथा 

मंगलसूत्र

         झोपड़ पट्टी के नजदीक समाज सेविका मनोरमा की गाड़ी रुकी । गाड़ी को बच्चों ने घेर लिया। खबर हर एक झोपड़ी तक पहुँच गई
       "मनोरमा ताई आई हैं।"
       औरतें झोपड़ियों से निकल उनके  संग संग चलने लगीं।
       "भोत बुरा हुआ ताई। मंदा का मरद नाले मेइच मर गया। 
भोत दारु पियेला था। पाँव फिसल गया नाले में।"
         वे मंदा के झोपड़े के सामने खड़ी हो गईं। मंदा चूल्हे पर भात पका रही थी। बच्चे थाली लिए बैठे थे।
          " कैसी है मंदा। आज मैं तेरे ही लिए आई हूँ। तेरे पति के मरने की खबर सुनकर। देख शहर के बड़े सेठ जी ने तेरे लिए मदद भेजी है। फैक्ट्री में काम भी दिला दूंगी तुझे।" कहते हुए उन्होंने रुपयों से भरा लिफाफा उसकी ओर बढ़ाया। 

       मंदा खड़ी हुई। उनके पैर छुए।
       "भोत दया है आपकी ताई पर मेरे को मदद नईं चईए। कमाती न मैं। बिल्डिंग में झाड़ू पोछा बर्तन करके।"
       " हाँ पर उतने में तेरा गुजारा कैसे होगा। तीन बच्चे हैं तेरे। पति की कमाई भी तो...... ।"
       "अच्छे से होगा ताई। पहले भी होता था न। मरद तो अपनी कमाई दारू में उड़ा देता था। उल्टा रोज मारता था मुझको। आधी-आधी रात तक गाली गलौज, उठापटक। एक रात भी चैन से नहीं सोई।"
         वे मंदा के चेहरे पर पीड़ा की रेखाएं स्पष्ट देख रहीं थीं। 
सहसा मंदा ने बेटी को आवाज दी।
      " रे छन्नो, ताई के लिए गिलास में लिमका ला। बड़ी बॉटल मंगाई है ताई। बच्चे तरस गए थे। तीनों की किताब कॉपी भी खरीद ली। मंगलसूत्र बेचकर।"
      मंदा उनके नजदीक आकर फुसफुसाई-- "भोत चुभता था ताई मंगलसूत्र।" 

संतोष श्रीवास्तव 

परिचय
संतोष श्रीवास्तव
 कहानी, उपन्यास, कविता, स्त्री विमर्श, संस्मरण की अब तक अठारह किताबे प्रकाशित। 

चार अंतरराष्ट्रीय (मॉरीशस, कम्बोडिया ताशकन्द, बैंकॉक) तथा 20 राष्ट्रीय स्तर के पुरस्कार मिल चुके है।

जेजेटी विश्वविद्यालय राजस्थान से पीएचडी की मानद उपाधि। "मुझे जन्म दो माँ" स्त्री के विभिन्न पहलुओं पर आधारित पुस्तक रिफरेंस बुक के रुप में विभिन्न विश्वविद्यालयों में सम्मिलित।

संतोष जी की 6 पुस्तकों पर मुम्बई विश्वविद्यालय,एस एन डी टी महिला महाविद्यालय तथा डॉ आंबेडकर विश्वविद्यालय आगरा से एम फिल हो चुका है ।
बिहार सासाराम के छात्र द्वारा लघु कथाओं पर शोध कार्य तथा
राजा भर्तहरि मत्स्य विश्वविद्यालय अलवर से उनकी कहानियों  पर पीएचडी हो रही है।

कहानी " एक मुट्ठी आकाश "SRM विश्वविद्यालय चैन्नई में बी.ए. के कोर्स में तथा लघुकथाएं महाराष्ट्र राज्य के 11वीं की बालभारती में

संतोष की कहानियों, लघुकथाओं, उपन्यासों के अंग्रेजी, मराठी, सिंधी, पंजाबी, गुजराती, तेलुगू, मलयालम ,बांग्ला, ओड़िया, नेपाली, उर्दू ,छत्तीसगढ़ी भाषाओं में अनुवाद हो चुके हैं।

राही सहयोग संस्थान रैंकिंग 2018 में वर्तमान में विश्व के टॉप 100 हिंदी लेखक लेखिकाओं  में  नाम शामिल।

द संडे इंडियन द्वारा प्रसारित  21वीं  सदी की 111 हिंदी लेखिकाओं में नाम शामिल।

भारत सरकार के मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा  विश्व भर के प्रकाशन संस्थानों को शोध एवं तकनीकी प्रयोग ( इलेक्ट्रॉनिक्स) हेतु देश की  उच्चस्तरीय पुस्तकों के अंतर्गत "मालवगढ़ की मालविका " उपन्यास का चयन

 केंद्रीय अंतर्राष्ट्रीय पत्रकार मित्रता संघ की मनोनीत सदस्य । जिसके अंतर्गत  26 देशो की प्रतिनिधि के तौर पर हिंदी के प्रचार, प्रसार के लिए यात्रा ।

सम्प्रति स्वतंत्र पत्रकारिता।

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