उक्त शृंखला के अंतर्गत बबिता कंसल की प्रस्तुति
लघुकथा
खुशी के रंग
"जरा सोचो मेघना !
अपनी नाजो से पली चिरैया..... जिसे हमने सब सुख सुविधाओं के साथ पाला, अभी आगे भी तो पढना चाहती है .... इतने बड़े संयुक्त परिवार मे रह पाएगी. ..... वो भी बड़ी बहू ...... सोचा है। कितनी जिम्मेदारी निभानी पड़ेगी..... ना कर पायी तो ... "
"चिरैया से भी पूछो ...."
क्यों नही निभा पाएगी?
"इतना अच्छा परिवार, इतना पढा लिखा संस्कारी लड़का
इतना बड़ा कारोबार, रूपया पैसा सब ही तो है। उसे पढाने को वो राजी है। अपनी शिक्षा आगे ले सकती है।
रही जिम्मेदारी तो प्यार और अपनत्व से वो भी उठा लेगी मेरी बेटी .... संयुक्त परिवार मे सब का साथ और प्यार भी मिलता है। जिम्मेदारी ही होती है। ऐसी सोच ठीक नही।"
बिटिया तुम्हारी कभी हां और कभी ना सुन कर दुविधा मे थी मै .... कही मैं गलत फैसला तो नही ले रही"?
दिल को मजबूत कर ये कड़ा फैसला ले लिया था।
ये सोचकर, कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नही मिलता।
लेकिनआज जब देखती हूँ।
"प्यार, अपनत्व से उन को अपनाया तुमने ....
जिम्मेदारी निभाते अपने पति के साथ सास, नन्द पूरे परिवार से भरपूर प्यार मान, आदर पाते मन बावरा खुशी से झुमने लगता है"।
"खुश रहो ...... मेरी चिरैया।"
बबिता कंसल
दिल्ली
अभिमत
खुशी के रंग लघुकथा 2019 मे लिखी थी।
समाज मे आज हर लड़की के माता पिता जब बेटी विवाह योग्य हो जाती है । तब उस के लिए ऐसा परिवार चाहते है । कि जहां बेटी को हर सुख सुविधा हो, साथ मे स्वतंत्र हो कोई रोक टोक ना हो । ये सब ध्यान मे रख चाहते है बेटी परिवार से अलग होकर रहे, कोई जिम्मेदारी उसे ना निभानी पड़े।इसी बात को ध्यान मे रखते हुए मैने ये कथा लिखी थी।
ऐसा नही की परिवार से अलग रह कर ही बेटी सुखी रहेगी। ये बहुत गलत धारणा है।
अपितु संयुक्त परिवार मे रह अपने व्यवहार से वह सब का दिल जीत कर सब से भरपूर प्यार दुलार पा, सब के सहयोग से अपनी जिम्मेदारी का भार भी साथ मिल जुल कर कम कर सकती है। जीवन सुख पूर्वक जी सकती है।
यही संदेश इस कथा के माध्यम से देने कि कोशिश की है ।
प्रकाशन
यह कथा जय विजय पत्रिका के अंक अप्रैल 2019 मे प्रकाशित हुई थी।
बबिता कंसल
दिल्ली
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लघुकथा
विभा रश्मि
पहली बारीश
पडौसी युगल को बारीश में भीगते देख अपनें कमरे की खिड़की के सहारे बैठी रेणु की सास मुंह ही मुंह मे उन्हें बेशर्म ,बेहया वगैराह न जाने क्या - क्या कह रही थी ।
घर के बरामदे मे सुधांशु के साथ बैठी रेणु दूर से ही उस पडौसी युगल की मस्त जिन्दगी का आनंद ले रही थी।
तभी गुड़िया ने ठुमकते हुए आकर मम्मी के कान मे कुछ कहां।
" पापा से पूछ लो"! रेणु ने कहा ।
यह सुन गुड़िया दोनों पैरो पर जोरों से ठुमक दी। कहा किसी से कुछ नही।
"सुनों गुड़िया बारीश मे नहाने के लिए पूछ रही है"।
ठुनक के माध्यम से जाहिर होती उसकी मंशा जानकर रेणु ने पति से विनती सी की।
"जानें दो " उसकी बात सुन सुधांशु ने कहा -"बारीश का थोड़ा आनंद उसे भी ले लेने दो '।
पापा की सहमति पाते ही गुड़िया बरामदे के पार जा पहुंची ।
इतने मे, अम्मा वहां आ गयी।
फटकार सुनाती हुई बोली
"पहली बारीश है, बीमार पड़ जाओगी । सर्दी लगेगी सो अलग कापी किताब निकाल लो और यही बैठ कर नजारा लो ,बारीश का चलो भीतर "।
लेकिन कौन सुनता ? गुड़िया तो हो गयी फुर्र, मस्त होने लगी बारीश मे।
आखिर सुधांशु बोला
"जाओ रेणु लिवा लाओ"!
रेणु का मन मयूर नाच उठा यह सुनते ही।
वह पल्लू संभालती जा कूदी बारीश की फुहारों मे।
भीगती हुई बेटी को पकड़ने का हो गया नाटक शुरू।
बेटी तो थी ही खेलने के मूड मे वो और दूर भाग गई।
"मै लाता हूँ अम्मा"!
यह देख सुधांशु ने कुर्सी से उठते हुए कहा और अम्मा का उत्तर सुने बगैर ही बरामदे से उतर नीचे की ओर दौड़ गये।
कितनी देर तक गुड़िया दौड़ दौड़ कर छकाती रही।
बेटे बहूकी चलाकी समझ ,अम्मा दो पल उन सब को देखती रही ।
पड़ोसी युगल की मस्ती को देखने से उपज रही कुछ देर पहले की बुदबुदाहट अब हल्की मुस्कुराहट मे बदल गयी।
खिड़की का परदा सरका कर वे तेजी से किचन की ओर जुड़ गयी।
सब के लिए चाय बना नें और पकौड़ियां तलने।
विभा रश्मि
अभिमत
विभा रश्मि जी वरिष्ठ रचनाकारों में है। जिन्होंने भिन्न-भिन्न विषयों पर अपनी लेखनी को उकेरा है। समाज में होनें वाली घटनाओं को कल्पना मात्र ही नहीं अपितु यथार्थ को दर्शाती है। विभा जी की अनेक लघुकथाएं संग्रह" सांस लेते लम्हे "जिसका विमोचन जुलाई 2020 मे हुआ था, को पढ़ना शुरु किया, तो उनके रसास्वादन को रोक न पायी पढ़ती ही चली गयी। लघुकथाओं में उनकी सजगता ,सकारात्मकता की झलक दिखाती देती है । पाठक को शुरू से अन्त तक बांधे रखती है । निराशा को स्थान न देकर लघुकथाओं में आत्ममंथन , आत्मविश्वास का दर्शन होता है । लघुकथाओं के विषय अलग और समाज में हो रही गतिविधियों से जुड़े हैं। ऐसी ही एक लघुकथा " पहली बारीश "में युगल मन के मनोभावों को दर्शन कराती बहुत ही सुन्दर ,सरल लघुकथा है। जिसमें सहज ही अम्मा को ग़लत बोलनें पर, पड़ोसी युगल के माध्यम से रेणु ओर सुधांशु के मनोभावों को उजागर किया है और कैसे रेणु और सुधांशु गुड़िया के माध्यम से अपनी मन की इच्छा को अम्मा को ये दर्शाते हुए पूरी करते हैं जैसे वह बेटी को पहली बारीश से बचा रहे हो । पाठक के मन को छू लेने वाला है। साधारण गृहस्थ युगल के मन पर गहरी छाप छोड़ देती है।
लघुकथा की भाषा, सरल, सहज है। भाषा शैली एक अच्छी लघुकथा के अनुरूप है।
लघुकथा में पात्रों की मनोदशा, व्यथा को बहुत गहरे तक दर्शाया गया है।
इस कारण यह लघुकथा मेरे मन के बहुत निकट है।
बबिता कंसल
दिल्ली

